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Nithari Case: 19 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को बरी किया, एक बार फिर उठा न्याय पर सवाल

निठारी कांड: 19 साल बाद फिर सुर्खियों में, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

नोएडा, नवंबर 2025
भारत के सबसे भयावह अपराधों में से एक निठारी कांड एक बार फिर चर्चा में है। साल 2006 में हुए इस कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था, जब नोएडा के निठारी गांव से बच्चों और महिलाओं के लापता होने के बाद दर्जनों मानव अस्थियाँ बरामद हुई थीं। अब, लगभग दो दशक बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया है, जिसमें आरोपी सुरेन्द्र कोली को सबूतों की कमी के चलते बरी कर दिया गया है।

image by news jagaran

क्या था निठारी कांड
निठारी कांड की शुरुआत साल 2005–2006 के बीच हुई जब नोएडा सेक्टर-31 के निठारी गांव से कई बच्चे और महिलाएं अचानक गायब होने लगीं।
पीड़ित परिवारों ने पुलिस से बार-बार शिकायत की, लेकिन पुलिस ने इसे शुरू में “घर से भाग जाने” का मामला बताकर नजरअंदाज कर दिया।

स्थिति तब बदल गई जब दिसंबर 2006 में निठारी के एक नाले से बच्चों की खोपड़ियां और हड्डियां मिलीं।
इन सबूतों ने पुलिस को उस बंगले तक पहुंचाया जो व्यवसायी मोनेन्दर सिंह पंढेर का था।
वहां काम करने वाला उसका नौकर सुरेन्द्र कोली जल्द ही पुलिस की गिरफ्त में आया।

कैसे खुला पूरा राज़
पुलिस और बाद में CBI की जांच में सामने आया कि कोली और पंढेर ने कई बच्चों और महिलाओं को बहला-फुसलाकर घर बुलाया, उनका यौन शोषण किया और फिर हत्या कर शवों को टुकड़ों में काटकर नाले में फेंक दिया।
जांच के दौरान 16 से ज़्यादा मानव अवशेष बरामद हुए।
यह मामला उस समय देशभर में सुर्खियों में छा गया था और इसे “भारत का सबसे भयावह सीरियल किलिंग केस” कहा गया।

अदालत में लंबा सफर
मामला पहले उत्तर प्रदेश पुलिस के पास था, लेकिन बाद में इसे CBI को सौंपा गया।
2007 से लेकर अब तक इस केस में कई मुकदमे चले।
CBI की चार्जशीट में कोली को मुख्य आरोपी बताया गया, जबकि पंढेर को कुछ मामलों में सह-अभियुक्त बनाया गया।
कोली को कई मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन समय के साथ कुछ फैसले अदालतों में पलट गए।
अब, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां पर्याप्त फोरेंसिक सबूत नहीं जुटा सकीं और गवाहों के बयान पर संदेह बना रहा।
इस आधार पर अदालत ने कोली को बरी कर दिया और कहा कि अभियोजन पक्ष “संदेह से परे” अपराध सिद्ध नहीं कर पाया।

अब फिर क्यों चर्चा में आया यह मामला
करीब 19 साल पुराने इस केस की चर्चा फिर इसलिए हुई क्योंकि अदालत का यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में फोरेंसिक साक्ष्य की अहमियत और जांच एजेंसियों की लापरवाही को फिर से उजागर करता है।


कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच में कई तकनीकी खामियां थीं —
जैसे अपराध स्थल से मिले नमूने सुरक्षित नहीं रखे गए, डीएनए रिपोर्ट अधूरी रही, और कई सबूत अदालत में पेश ही नहीं किए गए।
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने न्याय प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और गरीब परिवारों की अनदेखी पर सवाल उठाए हैं।

निठारी कांड ने क्या सिखाया
यह मामला सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का प्रतीक बन गया।
पुलिस की शुरुआती लापरवाही ने कई मासूमों की जान ली।
CBI और अदालतों की लंबी प्रक्रिया ने यह दिखाया कि भारत में न्याय पाने में सालों लग जाते हैं।
आज, 2025 में जब यह केस फिर सुर्खियों में आया है, तो यह हमें याद दिलाता है कि सटीक जांच, फोरेंसिक साक्ष्य और पारदर्शी न्याय प्रक्रिया कितनी जरूरी है।

संक्षेप में

बिंदुविवरण
स्थाननिठारी गांव, नोएडा, उत्तर प्रदेश
वर्ष2005–2006
मुख्य आरोपीमोनेन्दर सिंह पंढेर और सुरेन्द्र कोली
जांच एजेंसीCBI
अपराधअपहरण, यौन शोषण, हत्या
2025 अपडेटसुप्रीम कोर्ट ने कोली को सबूतों की कमी पर बरी किया
महत्वन्याय प्रणाली और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल

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