नई दिल्ली, दिसंबर 2025:
वैश्विक व्यापार में पिछले कुछ सालों से protectionist (सुरक्षा-मुखी) कदम बढ़ रहे हैं। अमेरिका ने पहले ही कई देशों के सामान पर भारी टैरिफ लगाए हैं, जिससे भारत समेत विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में ट्रेड तनाव बढ़ा है। इसी कड़ी में अब मैक्सिको ने भी भारत और अन्य एशियाई देशों के उत्पादों पर बड़े पैमाने पर टैरिफ बढ़ा दिए हैं।
पहले क्या हुआ — टैरिफ का इतिहास
- संयुक्त राज्य अमेरिका (US) ने 2025 में भारत समेत कई देशों के सामान पर 50% तक टैरिफ लगा दिया था, खासकर ऑटोमोटिव, इंजीनियरिंग, वस्त्र और अन्य निर्माण वस्तुओं पर। इस नीति का उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना और व्यापार घाटा कम करना बताया गया।
- यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार तनाव का हिस्सा रहा है।
- अब मैक्सिको ने इसी तरह की नीति अपनाई है, हालांकि उसने यह साफ़ किया है कि इसका मकसद विदेशी देशों को निशाना बनाना नहीं बल्कि अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा है। Business Standard
मैक्सिको ने क्या निर्णय लिया?
11 दिसंबर 2025 को मैक्सिको की सीनेट ने एक बड़ा निर्णय पास किया है, जिसके तहत 1,400 से अधिक उत्पादों पर 5% से 50% तक नए टैरिफ लागू किए जाएंगे। यह निर्णय 1 जनवरी 2026 से प्रभावी होगा।
मुख्य रूप से उन देशों के उत्पाद प्रभावित होंगे जिनके साथ मैक्सिको का कोई फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) नहीं है — उनमें भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया शामिल हैं।
किसके ऊपर प्रभाव सबसे ज़्यादा पड़ेगा?
- ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स:
- मैक्सिको ने कारों और ऑटो पुर्ज़ों पर टैरिफ को लगभग 50% तक बढ़ा दिया है, जिससे भारत से लगभग $1 बिलियन (~₹8–9 हज़ार करोड़) के निर्यात प्रभावित होने की आशंका है। Reuters+1
- स्टील, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग गुड्स:
- इन पर भी 25% से 35% तक शुल्क बढ़ाया गया है, जिससे भारतीय निर्यातकों को अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं
- टेक्सटाइल और वस्त्र:
- कपड़े और फैशन सामग्री पर भी उच्च टैरिफ लगाया गया है, जिससे व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और मांग पर असर पड़ेगा।
मैक्सिको सरकार का कहना है कि यह कदम घरेलू उद्योग की रक्षा, स्थानीय रोज़गार की सुरक्षा और व्यापार घाटे को सुधारने के लिए उठाया गया है। इसके अलावा, यह निर्णय USMCA (United States–Mexico–Canada Agreement) की समीक्षा से पहले मैक्सिको की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव, ट्रेड संतुलन सुधारने और विदेशी निर्भरता कम करने की कोशिश का हिस्सा है। The Economic Times
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