भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में गिनी जाने वाली अरावली पर्वतमाला इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला न केवल ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। हाल के घटनाक्रमों ने अरावली के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ी बहस
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वतमाला की नई कानूनी परिभाषा को लेकर दिए गए फैसले ने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। फैसले के अनुसार, अब केवल वही क्षेत्र अरावली पर्वत के अंतर्गत माने जाएंगे जिनकी ऊँचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर से अधिक है। इस बदलाव के कारण अरावली के कई छोटे-छोटे पहाड़ी हिस्से कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में निर्माण गतिविधियों और खनन को बढ़ावा दे सकता है, जिससे पहले से कमजोर हो चुकी अरावली को और नुकसान पहुँचेगा।
अवैध खनन बना सबसे बड़ा संकट
अरावली के लिए सबसे बड़ा खतरा अवैध खनन माना जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, बीते कुछ दशकों में अरावली का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा खनन और अतिक्रमण के कारण नष्ट हो चुका है। राजस्थान और हरियाणा के सीमावर्ती इलाकों में पत्थर, बजरी और अन्य खनिजों का अवैध दोहन लगातार जारी है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनन माफिया रात के समय सक्रिय रहते हैं और प्रशासन की कार्रवाई कागजों तक ही सीमित रह जाती है। इससे न केवल पहाड़ कट रहे हैं, बल्कि आसपास के गांवों में जल संकट और प्रदूषण भी बढ़ रहा है।
दिल्ली-NCR के लिए प्राकृतिक ढाल
पर्यावरण विशेषज्ञ अरावली को दिल्ली-NCR की जीवन रेखा मानते हैं। यह पर्वतमाला थार मरुस्थल से आने वाली धूल और रेत को रोकने का काम करती है। साथ ही, भू-जल स्तर को बनाए रखने और क्षेत्र के तापमान को नियंत्रित करने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
विशेषज्ञों की चेतावनी है कि अगर अरावली का क्षरण इसी गति से जारी रहा, तो दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण और बढ़ेगा, जल संकट गहराएगा और गर्मी की तीव्रता में भी इजाफा होगा।
SaveAravalli अभियान ने पकड़ा जोर
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान तेज हो गया है। पर्यावरण कार्यकर्ता, छात्र और आम नागरिक अरावली के संरक्षण की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर प्रकृति को नष्ट करना भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय है।
कई संगठनों ने सरकार से मांग की है कि अरावली को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित किया जाए और खनन पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए।
राजनीतिक बयानबाजी और प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी सामने आ रही हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि विकास परियोजनाओं के लिए नियमों में बदलाव जरूरी है, जबकि विपक्षी दल और सामाजिक संगठन इसे पर्यावरण के लिए घातक बता रहे हैं। राजस्थान और हरियाणा में अरावली को लेकर नई नीतियों की मांग भी उठने लगी है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में अरावली केवल नक्शों और किताबों तक सीमित रह जाएगी। वे सख्त कानून, प्रभावी निगरानी और जनभागीदारी को समाधान मानते हैं।
अरावली पर्वतमाला आज विकास, कानून और पर्यावरण के बीच संतुलन की परीक्षा दे रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अवैध खनन और बढ़ता शहरीकरण इसके अस्तित्व पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। अब यह सरकार, न्यायपालिका और समाज की साझा जिम्मेदारी है कि इस प्राचीन पर्वतमाला को बचाने के लिए ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाए जाएँ।
0 Comments